भोपाल। मध्य प्रदेश में राज्यसभा का चुनाव दिलचस्प हो गया है। एक सीट कांग्रेस के दिग्विजय सिंह तो एक सीट भाजपा के ज्योतिरादित्य सिंधिया को मिलना विधायकों की संख्या के हिसाब तय माना जा रहा है। तीसरी सीट पर मुकाबला अनुसूचित जाति विरुद्ध अनुसूचित जनजाति वर्ग के उम्मीदवार के बीच होगा। कांग्रेस ने फूलसिंह बरैया को अपना उम्मीदवार बनाया है। वहीं भाजपा ने इस सीट के लिए संघ की पृष्ठभूमि वाले डॉ. सुमेर सिंह सोलंकी का नाम घोषित किया है। विकल्प के तौर पर पूर्व मंत्री रंजना बघेल का भी नामांकन भरा गया है। दोनों वर्ग ने क्रास वोटिंग की संभावनाओं को देखते हुए आरक्षित वर्ग के प्रत्याशियों को चुनाव के लिए उतारा है।

दरअसल, राज्यसभा चुनाव में आदिवासी प्रत्याशी बनाए जाने का मुख्य कारण यह है कि भाजपा का जनाधार आदिवासी क्षेत्रों में मालवा से महाकोशल तक गिरा है। विधानसभा चुनाव 2018 में पार्टी को इन सीटों पर भारी नुकसान हुआ।

पिछले चुनाव में मिली आदिवासी सीटों पर गौर किया जाए तो 2013 के विधानसभा चुनावों में भाजपा ने आदिवासियों के लिए सुरक्षित 47 में से 31 सीटों पर जीत दर्ज की थी, एक अन्य निर्दलीय भी भाजपा का ही बागी प्रत्याशी था।

वहीं 2008 के चुनाव में भी 47 में से 31 आदिवासी सीटें भाजपा की झोली में गई थीं। वर्ष 2003 में परिसीमन से पहले आदिवासियों के लिए 41 सीटें आरक्षित थीं और भाजपा ने 37 सीटें जीती थीं। कुल मिलाकर देखा जाए तो मप्र में जब जब भाजपा की सरकार बनी तो आदिवासी वोटबैंक की भूमिका सबसे ज्यादा रही है।

जयस का डर

भारतीय जनता पार्टी को विधानसभा चुनाव में मिली पराजय की मुख्य वजह जय युवा आदिवासी किसान मजदूर संगठन ‘जयस’ रहा है। धार से लेकर आलीराजपुर तक फैले जयस के प्रभाव से भाजपा को कई सीटों पर यहां नुकसान उठाना पड़ा। यही कारण है कि जयस से निपटने के लिए भाजपा ने राज्यसभा के लिए मालवांचल के प्रत्याशी को टिकट दिया है।

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