जुलवानिया / जो कौम अपने इतिहास को भुला देती हैं, उन्हें इतिहास भी भुला ही देता है, जो लोग इतिहास से सबक नहीं लेते है वो मिट्टी में मिल जाते हैं. धर्मयुद्ध में कोई तटस्थ नहीं रह सकता, जो धर्म के साथ नहीं वह धर्म के विरुद्ध माना ही जाएगा. यह बात  पानीपत गौरव यात्रा” के संरक्षक एवं वरिष्ठ प्रचारक संदीप जी महिंद ने कही सोमवार को स्वराज्य के 75 वें अमृत महोत्सव के अंतर्गत पूना से पानीपत गौरव यात्रा लेकर आए चार सदस्य दल का आगमन हुआ गायत्री मंदिर सभागृह में गौरव यात्रा  मैं आए यात्री दल के साथ प्रांत के बौद्धिक प्रमुख सुनील जी बागुल समाजसेवी सुनील जी गुप्ता ने भारत माता के चित्र पर माल्यार्पण कर कार्यक्रम की शुरुआत की कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए यात्रा के संरक्षक संदीप महिंद्र ने कहा कि पानीपत की वह लड़ाई 14 जनवरी 1761 मकरसंक्रांति के बेहद सर्द दिन लड़ी गई थी. महाराष्ट्र, गुजरात, मध्य प्रदेश के रहने वाले मराठा उस ठण्ड के आदी नहीं थे और न ही उनके पास गर्म कपडे थे,

स्थानीय लोगों ने मराठा सैनिको को भोजन और गर्म कपड़े तक नहीं दिए. वो यह सोचते थे कि – अब्दाली से हमारी कोई दुश्मनी थोड़े ही है, जबकि पानीपत का युद्ध जीतने के बाद अब्दाली और स्थानीय मुसलमानों ने मराठों से ज्यादा स्थानीय हिन्दुओं और सिक्खों को नुकसान पहुंचाया था. पानीपत की तीसरी लड़ाई में आमने-सामने आ खड़ा हुआ था. पानीपत के खुले मैदान में सदाशिव राव भाऊ के नेतृत्व में कई माह से भूखी मराठा सेना अन्न के अंतिम कण को मुंह में रख, मुख पर हल्दी मल ‘हर हर महादेव’ का जयघोष करती, अपने से कहीं विशाल अहमद शाह अब्दाली की सेना पर टूट पड़ी. भूखो मरने से श्रेयस्कर शत्रु सेना के छक्के छुड़ाते रणभूमि में वीरगति को प्राप्त होना स्वीकार था मराठों को, केवल शत्रुसेना से लड़ना ही लक्ष्य नहीं था, साथ आये तीर्थ-यात्रियों की रक्षा का भी भार ढोया था  यात्रा में सुजल राव घोरपडे गणेश यादव रजनीश पिंगल कर, दीपक शर्मा अखिलेश साहू अशोक बागुल सुनील कौशल शिवराम सोलंकी विजय गोरे जितेंद्र यादव गोलू यादव संतोष गुप्ता सुरेश साहू महेश पटेल कार्यकर्ता मौजूद थे

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