बड़वानी / दिगम्बर जैन सिद्ध क्षेत्र पर विराजित संत शिरोमणि आचार्य श्री विद्यासागर जी के परम शिष्य युवा तरुणाई के प्रखर वक्ता मुनिश्री संधान सागर जी ने आज आराधना की साधना प्रयोगशाला शिविर में उत्तम त्याग धर्म पर बोलते हुए कहा की त्याग सर्वस्व का होता है, और दान अंश का होता है, दान और त्याग में ये मुख्य अंतर है मुनिश्रीने कहा की दान कब,क्यों, किसको और कहा देना है ,यह सब आपको सोचना है ,मुनिश्री ने बताया की एक बार धरती ने वृक्ष से कहा मैं तुम्हे फल देता हु रस देता हु और तू उसे लोगो में बांट देते हो तो में तुम्हे रस देना बंद कर दूंगा , तब धरती ने कहा बंद कर देना ,तब धरती ने वृक्ष को रस देना बंद कर दिया तब फल सब सुख गए वृक्ष भी सुख गए तब वृक्ष से धरती ने कहा बोल अब क्या देगा , तब फिर वृक्ष ने बोला की मेरी जो लकड़ी है वो लोगो को ईंधन जलाने के काम आयेगी , तब धरती ने उसका त्याग देख कर फिर से हरा भरा कर पुनः रस देदिया। मुनिश्री ने कहा की यदि आपको कुछ करना है तो पुण्य कमाओ और पुण्य कब कमाओगे, जो तुमने कमाया है उसको निकालो और उसका त्याग स्वरूप दान करो 4बात बताते हुए कामना,खाना,गंवाना और बचाना।
कामना कैसे? व्यापार और उद्योग ऐसा हो जिसमे हिंसा की मात्रा न्यूनतम हो और कमाई ज्यादा हो ।
दान का और त्याग का एक और उदाहरण नदी के ऊपर बांध बनाया जाता है, क्युकी जो वेस्ट पानी होता है उसे रोका जाता है और जो सुखा क्षेत्र है उसमे नहर के माध्यम से पहुंचाया जाता है और उसमे गेट भी लगाए जाते है, मतलब आपने जो संग्रह किया है उसे बाहर भी निकालते है ।


आचार्य श्री विद्या सागर जी कहते है की तरण नही वितरण के बीना ।अतः त्याग वही कर पाएगा जो सर्वस्व छोड़ पाएगा। 4प्रकार की लक्ष्मी होती है
भाग्य लक्ष्मी, पुण्य लक्ष्मी,पाप लक्ष्मी और अभिशिप्त लक्ष्मी । भाग्य लक्ष्मी भाग्य से मिलती है जो माता पिता और पूर्वजों ने कमाया वो मिल गया,कुछ लक्ष्मी हमे हमारे पुण्य से मिलती है और पाप लक्ष्मी गलत तरीके से ,निषेध तरीके से कमाने से मिलती है ,और जिस लक्ष्मी से आप गलत कार्य में शराब, जुआ, अनैतिक कार्य में उपयोग करे वो अभिक्षिप्त लक्ष्मी होती है।
मुनिश्री ने घनश्याम दास बिड़ला ने अपने पुत्र को लिखे पत्र को भी बताया की उन्होंने अपने बेटे से क्या कहा,बिड़ला जी ने लिखा की धन का उपयोग शौक, मौज के लिए मत करना,जन कल्याण और सेवा के लिए करना,धन शक्ति है इसके नशे में किसी का अन्याय न हो ,धन का उपयोग दिन,दुखियो को दान में करना, सदुपयोग करना, व अच्छे कार्य में करना भगवान को कभी भूलना नहीं ,स्वास्थ्य,सेवा,व्यायाम,पढ़ाई,के लिए दान करना, भोजन को दवाई के रूप में खाना आदि बाहर का त्याग त्याग नही है अंदर से कशायो का त्याग होना चाहिए। ध्यान की सिद्धि उसी को हो सकती है जो वस्त्रों का त्याग करे एवम जिसे रत्नत्रय की प्राप्ति हो।
आज लोग खाने के लिए ही जी रहे है
आज 4बाते प्रकृति,विकृति,दुष्क्रति,और संस्कृति
भूख लगने पर खाना प्रकृति,बीना भूख के खाना विकृति,दूसरे का छीन कर खाना दुष्कृति,दूसरे को खिला कर खाना संस्कृति है ।
मुनिश्री ने कहा की आवश्यकता से अधिक का संचय भी परिग्रह कहलाएगा अतः ये पाप का कारण बनेगा । ,अतः छोटा सा त्याग भी आपको उच्च गति की ओर ले जाएगा ।
मीडिया प्रभारी मनीष जैन ने बताया की इस अवसर पर मुनिश्री की उपस्थिति में दयोदय महासंघ द्वारा फटाको को निषेध और न छोड़ने की अपील के पोस्टर भी श्रावको की उपस्थिति में किया गया जिसमे फटाको से होने वाली हानियों और नुकसान को प्रदर्शित किया गया है । और साथ ही कई श्रावको ने फटाके ना छोड़ने का और ना लाने का नियम लिया ।प्रातः मुनिश्री जी ने भावना योग कराया, फिर गुरुभक्ति, भगवान के अभिषेक, शांतिधारा पूजन संपन्न हुई दोपहर को सामायिक,तत्वार्थ सूत्र,की क्लास शाम को प्रतिक्रमण, ध्यान ,आचार्य भक्ति ,आरती और एक मिनिट प्रतियोगिता संपन्न हुई ।

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