भोपाल / इस सदी में अब तक  मध्य प्रदेश में पांच लोकसभा चुनाव हुए। पिछले दो आम चुनाव में कांग्रेस को हार का सामना करना पड़ा है, जबकि दो चुनाव में भाजपा को पराजय मिली। 2004 के चुनाव में एनडीए की अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार ने चुनाव को विकास के मुद्दे पर लड़ा, लेकिन जनता ने एनडीए सरकार को उखाड़ फेंका था। 2009 के चुनाव में भाजपा ने लालकृष्ण आडवाणी के चेहरे पर चुनाव लड़ा, लेकिन पराजय ही मिली।

फिर 2014 में हुए चुनाव में कांग्रेस नेतृत्व वाली तत्कालीन यूपीए सरकार की एंटी इंकम्बेंसी और देश में मोदी लहर के चलते कांग्रेस प्रदेश में लोकसभा चुनाव बुरी तरह हारी। 2019 में फिर यही हुआ। भाजपा को मोदी लहर का जबरदस्त लाभ मिला और पार्टी ने अपने पुराने सारे रिकार्ड तोड़ दिए। मध्य प्रदेश में भाजपा को 29 में से 28 सीट पर विजय मिली। कांग्रेस में रहते हुए ज्योतिरादित्य सिंधिया जैसे नेता भी चुनाव हार गए।

इस बार सदी के पांचवे चुनाव में भी भाजपा का चेहरा प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ही हैं। हालांकि यह चुनाव अलग है। इस बार भाजपा ने 29 सीट जीतने का लक्ष्य रखकर मध्य प्रदेश में चुनाव लड़ा, लेकिन आधा दर्जन से ज्यादा सीटें ऐसी हैं, जहां भाजपा को कांग्रेस ने कड़ी चुनौती दी।

पहले चरण की सीट छिंदवाड़ा में कांग्रेस से नकुल नाथ के कारण पूर्व मुख्यमंत्री कमल नाथ की प्रतिष्ठा दांव पर लगी है। यही एक मात्र सीट ऐसी है जो पिछले चुनाव में कांग्रेस जीती थी। इस बार भी यहां कांटे का संघर्ष है। भाजपा ने छिंदवाड़ा से विवेक साहू को टिकट दिया था। गुना सीट से केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया को कांग्रेस के यादवेंद्र सिंह ने चुनौती दी। सिंधिया यहां मजबूत स्थिति में रहे।

राजगढ़ लोकसभा सीट में एक बार फिर 33 वर्ष बाद कांग्रेस नेता और पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह अपना राजनीतिक भविष्य तलाश रहे हैं। सिंह ने भाजपा सांसद रोडमल नागर को कड़ी चुनौती दी हैं। राजगढ़ सीट पर देश की निगाहें टिकी हुई हैं। अब देखना यह है की इस रोचक मुकाबले में कौन किसे कितने अंतर से मात दे पाता है। माना जा रहा है कि राजगढ़ सीट से मामूली अंतर से परिणाम तय होंगे।

तीन आदिवासी सीटों वाले मालवांचल में इस लोकसभा चुनाव में भाजपा-कांग्रेस के बीच कड़ा संघर्ष रहा है। पिछले वर्ष हुए विधानसभा चुनाव 2023 के परिणामों पर नजर डालें तो खरगोन, रतलाम और धार जैसी सुरक्षित सीटों पर कांग्रेस ने अधिक सीटें जीती थीं। यही वजह है कि इन क्षेत्रों में कांग्रेस उत्साहित थी। रतलाम-झाबुआ सीट से पूर्व केंद्रीय मंत्री कांतिलाल भूरिया कांग्रेस के प्रत्याशी हैं तो भाजपा से अनीता नागर चौहान।  दोनों के बीच कड़ा मुकाबला हुआ है। यहां के परिणाम भी चौकाने वाले आ सकते हैं। खरगोन में गजेंद्र सिंह पटेल भाजपा और कांग्रेस के नए चेहरे पोरलाल खरते के बीच संघर्ष बराबरी का रहा है। भाजपा प्रत्याशी के खिलाफ यहां एंटी इनकमबैंसी थी, यही वजह है कि प्रधानमंत्री को यहां प्रचार के लिए आना पड़ा था।

उज्जैन में भाजपा ने सांसद अनिल फिरोजिया और कांग्रेस ने महेश परमार में से एक चुना जाएगा। इंदौर में भाजपा सांसद शंकर लालवानी का चुनाव एकतरफा रहा। यहां से कांग्रेस प्रत्याशी अक्षय कांति बम ने पहले ही मैदान छोड़ दिया था।

मुरैना, मंडला, धार और खरगोन ऐसी संसदीय सीट हैं, जहां कांग्रेस ने उत्साह के साथ चुनाव लड़ा। वर्ष 2023 के विधानसभा चुनाव में भी इन संसदीय सीट की पांच- पांच, भिंड, ग्वालियर, बालाघाट, रतलाम लोकसभा क्षेत्र की चार-चार, टीकमगढ़ की तीन विधानसभा सीटों पर भाजपा हारी थी, इसका प्रभाव लोकसभा चुनाव में भी दिखाई दिया। इन सीटों पर भाजपा को कड़ा संघर्ष करना पड़ा।

सतना से चार बार के सांसद गणेश सिंह को कांग्रेस के प्रत्याशी विधायक सिद्धार्थ कुशवाहा ने पसीने छुटवा दिए। आदिवासी सीट मंडला में भी कांटे का संघर्ष है तो आदिवासी बहुल सीट बालाघाट और सीधी में तीसरे प्रत्याशी की मौजूदगी ने भाजपा-कांग्रेस के समीकरण बिगाड़ दिए।  मध्य भारत में केवल होशंगाबाद में थोड़ा संघर्ष था लेकिन भाजपा की परंपरागत सीट होने से कोई बदलाव दिखाई नहीं पड़ रहा है। विदिशा सीट से भी पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान का चुनाव एकतरफा ही रहा।

 

 

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