बड़वानी/   नर्मदा घाटी में आज सैकड़ों आदिवासी, किसान-मजदूर और सभी प्रवृतिजीवी एकत्रित आकर एक सशक्त सम्मेलन के द्वारा संयुक्त किसान मोर्चा के बैनर तले आवाज उठा चुके हैं- हर उपज के लिए सही समर्थन मूल्य की ग्यारंटी और उसके लिए कानून लाने के लिए।

        पूरे देश के किसान-मजदूर आज भुगत रहे हैं, महंगाई और कंपनीयों के कमाई के लिए बढ़ी हुई लागत! किसानों को स्वामिनाथन आयोग की सिफारिशों के अनुसार एक रु. लागत पर 1.5 रु. का दाम भी नहीं मिल रहा है, और इसीलिए 715 किसानों ने शहादत देते हुए चले 13 महिनों के आंदोलन के बाद भी केंद्र की मोदी सरकार ने अन्नदाताओं को फंसाया है।

      उन्होंने दिया था आश्वासन, MSP ग्यारंटी के लिए समिति बनाने का, लेकिन उस पर भी धोखाधड़ी हो चुकी है। किसानों की आत्महत्याएं जारी है, जबकि कंपनीयाँ लॉकडाउन में भी अपनी कमाई कई गुना बढ़ा चुकी है। इस वीभत्स विषमता के बीच किसान याने प्रकृति पर जीने वाले सभी समुदाय मछुआरे, पशुपालक भी सब अब तय कर चुके हैं, अपना जीने का, आजीविका का और सही दाम का अधिकार लेने लिए कड़ा संघर्ष करेंगे।

      सनोबर मंसूरी ने महिला किसानों की बात अत्याचार कहकर, उस पर शासन को चुनौती दी! उन्होंने कहा, महंगाई के बीच मेहनतकशों के उत्पाद का, जो बुनियादी जरूरते पूरी करते हैं, उसका सही दाम न देने वाली अर्थव्यवस्था संविधान को कुचल रही है और करोड़ो लोग बेरोजगारी और भूखमरी भुगत रहे हैं।

     श्यामा मछुआरा ने मच्छीमारों की ताकत प्रकट करते हुए कहा कि हम मछुआरे भी मत्स्याखेट करते हैं जब कि शासन हमारी जलाशय की खेती भी छीनकर ठेकेदारों को सरदार सरोवर को भी सौंपना चाहते है।

बाबूभाई, ग्राम – लोणसरा के नेता ने उदाहरण देकर बताया, कैसे कंपनीया हजारो रु. के भिंडी के बीज में फंसाती है। उस पर आवाज उठाने से भारतीय किसान संघ के नुमाइंदे कंपनी से समझौता करना चाहते थे किन्तु किसानों ने उपभोक्ता फोरम तक जाकर सच्चाई सामने लायी। उन्होंने किसानों को फसाने वाले कंपनीयों को और उनसे भागीदारी करने वाले संगठन को भी चेतावनी दी।

       चंदूभाई यादव, जगदीश पटेल और देवराम कनेरा ने कहा कि महंगाई के साथ भी लूट चल रही है, जिसमें सभी गरीब हैरान है। सभी त्रस्त है, अपनी आजीविका छीनी जाने से! साल में 7000 रु. मात्र बचा पाते हैं कई मजदूर, सीमांत किसान…… जो आज पेट्रोल पर गाड़ी भी चला नही पाते! किसानों की फसल का सही दाम मिलेगा, तो ही बढ़ेगी मजदूरी भी। सभी ने ऐलान किया कि संयुक्त किसान मोर्चा जीवित रहे और कड़े संघर्ष के द्वारा आगे बढ़े!

दुर्गेश भाई खवसे ने बताया कि कलकारखाने में कार्य करने वाले श्रमिक भी किसानों के बेटे बेटीयाँ है और दोनो स्तर पर लूटखसोट मची है, कंपनीकरण द्वारा!

सुरेश प्रधान, निसरपुर के किसान ने बिजली का मुद्दा उठाया और कहा कि शासन बिजली के लोडशोडिंग द्वारा फिर फसले बरबाद कर रही है। इससे किसानों को लाखों का नुकसान भुगतना पड़ रहा है।

     विजयभाई मरोला, खापरखेडा ने मध्य प्रदेश शासन की पुनर्वास कार्यालय और कार्य खत्म करने की साजिश उजागर करते हुए कहा कि हम उसका कड़ा विरोध करते हैं क्योंकि हजारो परिवार आज भी न्यायपूर्ण पुनर्वास नहीं पाये हैं। टीन शेड में रखे गये डुबग्रस्तों की बिजली, पानी काटकर शासन जीवन में जहर घोल रही है। हमें सभी प्रकार की वंचना और शोषण के खिलाफ लड़ना ही पड़ेगा!

     वरिष्ठ पत्रकार रामस्वरूप मंत्री जी ने किसानों को याद दिलायी कि 2014 और 2019 के चुनाव प्रचार में किसानों की आय दुगुनी करनेका झूठा वादा किया था, जो अब वे भूल गये हैं। मध्य प्रदेश में व्यापारीयो से किसानों के साथ हो रही ठगी, और प्रकृति से निकली उपज का दाम न देकर हो रही लूट के खिलाफ लड़ने का ऐलान किया।

अधिवक्ता आराधना भार्गव ने बताया कि किसानों को कई सारी साजिशें समझ में नहीं आती! अडानी के सायलोज याने गोदामों मे जो अनाज, अव्वा के सव्वा भाडा देकर शासन रखती जा रही है, उससे अब राशन व्यवस्था खत्म करने जा रही है शासन! आज लूट और शोषण, विस्थापन भुगतने पर भी शासन कोई जवाबदेहीता नही दिखा रही है। न्यायपालिका से भी न्याय पाना मुश्किल हो रहा है। किसान आंदोलन ने हासिल की 3 कानूनों की वापसी की जीत को भारतीय किसान संघ या सर्वोच्च अदालत से बनायी कंपनीतर्फा विचार रखने वाली समिति नहीं मानती है; लेकिन किसान और मजदूर खुद अपनी जमीन पुख्ति करके ही जीने का अधिकार पायेगा। किसान विरोधी संगठनो का म.प्र. और केंद्र की शासन सराहती रहे लेकिन किसान उनसे भ्रमित न होते हुए अपना भला समझे और जल, जंगल, जमीन बचाये।

    डॉ. सुनीलम ने वह अपने जोशपूर्ण वक्तव्य में कहा कि नर्मदा बचाओ आंदोलन, संयुक्त किसान मोर्चा अगुवाही में रहता आया है, और आज नये दौर में जा रहा है, यह बड़ी बात है। म. प्रदेश की और केंद्र की सरकार मेधा पाटकर जैसे आंदोलनकारियों से डरती है, बंदूक से या पार्टी से नही! आंदोलन का नैतिक बल और इतिहास जो कुचला न जाने वाली ताकत बताता है, वहीं सरकार को डराता है और शासन उसे कुचलना चाहता है।

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